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हाथियों के संरक्षण और संवर्धन के लिए जारी विष्णुदेव सरकार का पैसा खा गए कटघोरा के वन अधिकारी

सरकार ने खोला खजाना, अफसरों ने किया खेल

कोरबा। जंगल, जानवर और जनहित के नाम पर बहाए जा रहे करोड़ों रुपये अब सवालों के घेरे में हैं। कटघोरा वनमंडल में हाथियों के लिए बनाए जा रहे जलस्रोतों की हकीकत सामने आते ही पूरे सिस्टम की कार्यप्रणाली पर गंभीर संदेह खड़ा हो गया है। आरोप इतने गंभीर हैं कि यह मामला सिर्फ भ्रष्टाचार नहीं, बल्कि वन्यजीवों के अस्तित्व से खिलवाड़ तक पहुंचता नजर आ रहा है।

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विष्णुदेव साय की सरकार द्वारा लेमरू हाथी रिजर्व सहित वन क्षेत्रों में हाथियों के संरक्षण और संवर्धन के लिए करोड़ों रुपये आबंटित किए गए हैं, ताकि गर्मी के मौसम में जल संकट से जूझ रहे वन्यजीवों को राहत मिल सके। योजनाओं का उद्देश्य स्पष्ट था—जंगलों में तालाब, स्टॉप डेम और अन्य जलस्रोत बनाकर हाथियों के लिए स्थायी पानी की व्यवस्था करना। लेकिन जमीनी हकीकत यह संकेत दे रही है कि यह पैसा अपने उद्देश्य तक पहुंचने के बजाय बीच रास्ते में ही “गायब” हो रहा है।

कागजों में विकास, जमीन पर विनाश

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लेमरू हाथी रिजर्व के तहत स्वीकृत तालाबों का मकसद था हाथियों को पानी उपलब्ध कराना, लेकिन केंदई वनपरिक्षेत्र के पतुरियाडाँड़ जंगल में बना तथाकथित तालाब इस योजना की पोल खोल रहा है। जहां लाखों रुपये खर्च दिखाए गए, वहीं जमीन पर अधूरा और बेकार ढांचा खड़ा कर दिया गया।

16 लाख का खेल, जमीनी सच्चाई में फर्जीवाड़ा

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करीब 16 लाख रुपये की स्वीकृति के बावजूद मौके पर जो दिखता है, वह कुछ लाख का काम भी नहीं लगता। ग्रामीणों के मुताबिक, पहले से मौजूद नाले को ही थोड़ा-बहुत बदलकर तालाब घोषित कर दिया गया। यह सीधा-सीधा सरकारी राशि के दुरुपयोग का मामला प्रतीत होता है।

मजदूरों के नाम पर हेराफेरी

रिकॉर्ड में मजदूरों से काम दिखाया गया, लेकिन असलियत में मशीनों से काम किया गया। जेसीबी और ट्रैक्टर से कुछ ही दिनों में काम निपटाकर कागजों में भारी खर्च दिखा दिया गया। जंगल से पत्थर उठाकर लागत और कम कर दी गई—यानी हर स्तर पर ‘सेटिंग’ का खेल।

तालाब सूखा, जानवर प्यासे

सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि यह तथाकथित तालाब पानी तक नहीं रोक पा रहा। एशियाई हाथी जैसे विशाल वन्यजीवों के लिए बनाया गया यह जलस्रोत आज खुद ही सूखा पड़ा है। ऐसे में संरक्षण की पूरी अवधारणा पर सवाल उठना लाजमी है।

अधिकारियों की भूमिका संदिग्ध

केंदई वनपरिक्षेत्र के जिम्मेदार अधिकारियों की भूमिका अब सवालों के घेरे में है। सूत्र बताते हैं कि यह मामला अकेला नहीं है—पहले भी कई निर्माण कार्यों में गड़बड़ियों की आशंका जताई गई है, लेकिन कार्रवाई हमेशा ठंडी पड़ जाती है।

जांच या लीपापोती?

कोरबा के वन क्षेत्रों में पहले भी कई घोटाले सामने आए, लेकिन हर बार जांच के नाम पर मामला दबा दिया गया। दोषियों पर कार्रवाई के बजाय उन्हें बचाने का खेल ज्यादा नजर आता है।

अब जवाबदेही तय होगी या फिर वही कहानी?

यह मामला सिर्फ पैसों का नहीं, बल्कि जंगल और वन्यजीवों के भविष्य का है। अगर हाथियों के लिए बनाए जा रहे जलस्रोत ही फर्जी साबित होंगे, तो संरक्षण की पूरी नीति पर सवाल उठेंगे।

जंगल लूट का खुला खेल जारी

कोरबा के जंगलों से उठ रही यह कहानी साफ बता रही है—

यह सिर्फ भ्रष्टाचार नहीं, बल्कि सिस्टम की नाकामी और जिम्मेदारों की मिलीभगत का बड़ा उदाहरण है।

अगर समय रहते सख्त कार्रवाई नहीं हुई, तो आने वाले दिनों में जंगल सूखेंगे, जानवर मरेंगे और जिम्मेदार बच निकलेंगे।

A Pranav

professional journalist

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